मंगलवार, 24 मार्च 2015

नवरात्र :देवी का चतुर्थ स्वरुप कूष्माण्डा

आज जानिए देवी  चतुर्थ स्वरुप कूष्माण्डा देवी को (विकिपीडिया से साभार)

नवरात्र-पूजन के चौथे दिन कूष्माण्डा देवी के स्वरूप की ही उपासना की जाती है। इस दिन साधक का मन 'अदाहत' चक्र में अवस्थित होता है।
कुष्मांडा : मां दुर्गा का चौथा स्वरूप
नवरात्रि में दुर्गा पूजा के अवसर पर बहुत ही विधि-विधान से माता दुर्गा के नौ रूपों की पूजा-उपासना की जाती है। आइए जानते हैं चौथी देवी मां कुष्मांडा के बारे में :-
नवरात्रि में चौथे दिन देवी को कुष्मांडा के रूप में पूजा जाता है। अपनी मंद, हल्की हंसी के द्वारा अण्ड यानी ब्रह्मांड को उत्पन्न करने के कारण इस देवी को कुष्मांडा नाम से अभिहित किया गया है। जब सृष्टि नहीं थी, चारों तरफ अंधकार ही अंधकार था, तब इसी देवी ने अपने ईषत्‌ हास्य से ब्रह्मांड की रचना की थी। इसीलिए इसे सृष्टि की आदिस्वरूपा या आदिशक्ति कहा गया है।
इस देवी की आठ भुजाएं हैं, इसलिए अष्टभुजा कहलाईं। इनके सात हाथों में क्रमशः कमण्डल, धनुष, बाण, कमल-पुष्प, अमृतपूर्ण कलश, चक्र तथा गदा हैं। आठवें हाथ में सभी सिद्धियों और निधियों को देने वाली जप माला है। इस देवी का वाहन सिंह है और इन्हें कुम्हड़े की बलि प्रिय है। संस्कृति में कुम्हड़े को कुष्मांड कहते हैं इसलिए इस देवी को कुष्मांडा।
इस देवी का वास सूर्यमंडल के भीतर लोक में है। सूर्यलोक में रहने की शक्ति क्षमता केवल इन्हीं में है। इसीलिए इनके शरीर की कांति और प्रभा सूर्य की भांति ही दैदीप्यमान है। इनके ही तेज से दसों दिशाएं आलोकित हैं। ब्रह्मांड की सभी वस्तुओं और प्राणियों में इन्हीं का तेज व्याप्त है।
अचंचल और पवित्र मन से नवरात्रि के चौथे दिन इस देवी की पूजा-आराधना करना चाहिए। इससे भक्तों के रोगों और शोकों का नाश होता है तथा उसे आयु, यश, बल और आरोग्य प्राप्त होता है। यह देवी अत्यल्प सेवा और भक्ति से ही प्रसन्न होकर आशीर्वाद देती हैं। सच्चे मन से पूजा करने वाले को सुगमता से परम पद प्राप्त होता है।
विधि-विधान से पूजा करने पर भक्त को कम समय में ही कृपा का सूक्ष्म भाव अनुभव होने लगता है। यह देवी आधियों-व्याधियों से मुक्त करती हैं और उसे सुख समृद्धि और उन्नति प्रदान करती हैं। अंततः इस देवी की उपासना में भक्तों को सदैव तत्पर रहना चाहिए।
सुरासम्पूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च। दधाना हस्तपद्माभ्यां कुष्मांडा शुभदास्तु मे। हीं

रविवार, 22 मार्च 2015

नवरात्र :देवी का तृतीय स्वरुप चन्द्रघण्टा

आज यानी शक्ति की उपासना के तीसरे दिन, माँ दुर्गा के तीसरे स्वरुप, देवी चन्द्रघण्टा  की भक्ति में खोजाइये। (विकीपीडिया से साभार)

माँ दुर्गाजी की तीसरी शक्ति का नाम चंद्रघंटा है। नवरात्रि उपासना में तीसरे दिन की पूजा का अत्यधिक महत्व है और इस दिन इन्हीं के विग्रह का पूजन-आराधन किया जाता है। इस दिन साधक का मन 'मणिपूर' चक्र में प्रविष्ट होता है।
चंद्रघंटा : मां दुर्गा का तीसरा स्वरूप
नवरात्रि में दुर्गा पूजा के अवसर पर बहुत ही विधि-विधान से माता दुर्गा के नौ रूपों की पूजा-उपासना की जाती है। आइए जानते हैं तीसरी देवी चंद्रघंटा के बारे में :-
नवरात्रि में तीसरे दिन इसी देवी की पूजा का महत्व है। इस देवी की कृपा से साधक को अलौकिक वस्तुओं के दर्शन होते हैं। दिव्य सुगंधियों का अनुभव होता है और कई तरह की ध्वनियां सुनाई देने लगती हैं।
मां दुर्गा की तीसरी शक्ति हैं चंद्रघंटा। नवरात्रि में तीसरे दिन इसी देवी की पूजा-आराधना की जाती है। देवी का यह स्वरूप परम शांतिदायक और कल्याणकारी है। इसीलिए कहा जाता है कि हमें निरंतर उनके पवित्र विग्रह को ध्यान में रखकर साधना करना चाहिए। उनका ध्यान हमारे इहलोक और परलोक दोनों के लिए कल्याणकारी और सद्गति देने वाला है। इस देवी के मस्तक पर घंटे के आकार का आधा चंद्र है। इसीलिए इस देवी को चंद्रघंटा कहा गया है। इनके शरीर का रंग सोने के समान बहुत चमकीला है। इस देवी के दस हाथ हैं। वे खड्ग और अन्य अस्त्र-शस्त्र से विभूषित हैं।
सिंह पर सवार इस देवी की मुद्रा युद्ध के लिए उद्धत रहने की है। इसके घंटे सी भयानक ध्वनि से अत्याचारी दानव-दैत्य और राक्षस काँपते रहते हैं। नवरात्रि में तीसरे दिन इसी देवी की पूजा का महत्व है। इस देवी की कृपा से साधक को अलौकिक वस्तुओं के दर्शन होते हैं। दिव्य सुगंधियों का अनुभव होता है और कई तरह की ध्वनियां सुनाईं देने लगती हैं। इन क्षणों में साधक को बहुत सावधान रहना चाहिए।
इस देवी की आराधना से साधक में वीरता और निर्भयता के साथ ही सौम्यता और विनम्रता का विकास होता है। इसलिए हमें चाहिए कि मन, वचन और कर्म के साथ ही काया को विहित विधि-विधान के अनुसार परिशुद्ध-पवित्र करके चंद्रघंटा के शरणागत होकर उनकी उपासना-आराधना करना चाहिए। इससे सारे कष्टों से मुक्त होकर सहज ही परम पद के अधिकारी बन सकते हैं। यह देवी कल्याणकारी है।

पिण्डजप्रवरारूढ़ा चण्डकोपास्त्रकेर्युता। प्रसादं तनुते मह्यं चंद्रघण्टेति विश्रुता॥
-विकीपीडिया से साभार

नवरात्र: देवी का द्वितीय स्वरुप ब्रह्मचारिणी

व्रत-त्यौहार लेबल के अंतर्गत आज जानिए देवी दुर्गा के द्वितीय स्वरुप ब्रह्मचारिणी के बारे में। (विकीपीडिया से साभार)

नवरात्र पर्व के दूसरे दिन माँ ब्रह्मचारिणी की पूजा-अर्चना की जाती है। साधक इस दिन अपने मन को माँ के चरणों में लगाते हैं। ब्रह्म का अर्थ है तपस्या और चारिणी यानी आचरण करने वाली। इस प्रकार ब्रह्मचारिणी का अर्थ हुआ तप का आचरण करने वाली।
ब्रह्मचारिणी : मां दुर्गा का दूसरा स्वरूप
नवरात्रि में दुर्गा पूजा के अवसर पर बहुत ही विधि-विधान से माता दुर्गा के नौ रूपों की पूजा-उपासना की जाती है। आइए जानते हैं ‍दूसरी देवी ब्रह्मचारिणी के बारे में :-
भगवान शंकर को पति रूप में प्राप्त करने के लिए घोर तपस्या की थी। इस कठिन तपस्या के कारण इस देवी को तपश्चारिणी अर्थात्‌ ब्रह्मचारिणी नाम से अभिहित किया।
मांदुर्गा की नवशक्ति का दूसरा स्वरूप ब्रह्मचारिणी का है। यहां ब्रह्म का अर्थ तपस्या से है। मां दुर्गा का यह स्वरूप भक्तों और सिद्धों को अनंत फल देने वाला है। इनकी उपासना से तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार और संयम की वृद्धि होती है। ब्रह्मचारिणी का अर्थ तप की चारिणी यानी तप का आचरण करने वाली। देवी का यह रूप पूर्ण ज्योतिर्मय और अत्यंत भव्य है। इस देवी के दाएं हाथ में जप की माला है और बाएं हाथ में यह कमण्डल धारण किए हैं।
पूर्वजन्म में इस देवी ने हिमालय के घर पुत्री रूप में जन्म लिया था और नारदजी के उपदेश से भगवान शंकर को पति रूप में प्राप्त करने के लिए घोर तपस्या की थी। इस कठिन तपस्या के कारण इन्हें तपश्चारिणी अर्थात्‌ ब्रह्मचारिणी नाम से अभिहित किया गया। एक हजार वर्ष तक इन्होंने केवल फल-फूल खाकर बिताए और सौ वर्षों तक केवल जमीन पर रहकर शाक पर निर्वाह किया।
कुछ दिनों तक कठिन उपवास रखे और खुले आकाश के नीचे वर्षा और धूप के घोर कष्ट सहे। तीन हजार वर्षों तक टूटे हुए बिल्व पत्र खाए और भगवान शंकर की आराधना करती रहीं। इसके बाद तो उन्होंने सूखे बिल्व पत्र खाना भी छोड़ दिए। कई हजार वर्षों तक निर्जल और निराहार रह कर तपस्या करती रहीं। पत्तों को खाना छोड़ देने के कारण ही इनका नाम अपर्णा नाम पड़ गया।
कठिन तपस्या के कारण देवी का शरीर एकदम क्षीण हो गया। देवता, ऋषि, सिद्धगण, मुनि सभी ने ब्रह्मचारिणी की तपस्या को अभूतपूर्व पुण्य कृत्य बताया, सराहना की और कहा -हे देवी आज तक किसी ने इस तरह की कठोर तपस्या नहीं की। यह तुम्हीं से ही संभव थी। तुम्हारी मनोकामना परिपूर्ण होगी और भगवान चंद्रमौलि शिवजी तुम्हें पति रूप में प्राप्त होंगे। अब तपस्या छोड़कर घर लौट जाओ। जल्द ही तुम्हारे पिता तुम्हें बुलाने आ रहे हैं।
मां ब्रह्मचारिणी देवी की कृपा से सर्वसिद्धि प्राप्त होती है। दुर्गा पूजा के दूसरे दिन देवी के इसी स्वरूप की उपासना की जाती है। इस देवी की कथा का सार यह है कि जीवन के कठिन संघर्षों में भी मन विचलित नहीं होना चाहिए।
दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलू। देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा॥
-विकीपीडिया से साभार

शनिवार, 21 मार्च 2015

नवरात्र: देवी का प्रथम स्वरूप शैलपुत्री

व्रत त्यौहार में आज नवरात्र घटस्थापना के दिन देवी के विभिन्न रूपों में 
से प्रथम रूप शैलपुत्री के बारे में जानकारी- (विकिपीडिया से साभार )

प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रहमचारिणी

तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम


पंचमं स्क्न्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति


सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम


नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः।

देवी दुर्गा के नौ रूप होते हैं। 
दुर्गाजी पहले स्वरूप में 'शैलपुत्री' के नाम से जानी जाती हैं।ये ही नवदुर्गाओं में प्रथम दुर्गा हैं। पर्वतराज हिमालय के घर पुत्री रूप में उत्पन्न होने के कारण इनका नाम 'शैलपुत्री' पड़ा। नवरात्र-पूजन में प्रथम दिवस इन्हीं की पूजा और उपासना की जाती है।
शैलपुत्री : मां दुर्गा का पहला रूप देवी शैलपुत्री
नवरात्रि में दुर्गा पूजा के अवसर पर बहुत ही विधि-विधान से माता दुर्गा के नौ रूपों की पूजा-उपासना की जाती है। आइए जानते हैं प्रथम देवी शैलपुत्री के बारे में :-
मां दुर्गा को सर्वप्रथम शैलपुत्री के रूप में पूजा जाता है। हिमालय के वहां पुत्री के रूप में जन्म लेने के कारण उनका नामकरण हुआ शैलपुत्री। इनका वाहन वृषभ है, इसलिए यह देवी वृषारूढ़ा के नाम से भी जानी जाती हैं। इस देवी ने दाएं हाथ में त्रिशूल धारण कर रखा है और बाएं हाथ में कमल सुशोभित है। यही देवी प्रथम दुर्गा हैं। यही सती के नाम से भी जानी जाती हैं। उनकी एक मार्मिक कहानी है।
एक बार जब प्रजापति ने यज्ञ किया तो इसमें सारे देवताओं को निमंत्रित किया, भगवान शंकर को नहीं। सती यज्ञ में जाने के लिए विकल हो उठीं। शंकरजी ने कहा कि सारे देवताओं को निमंत्रित किया गया है, उन्हें नहीं। ऐसे में वहां जाना उचित नहीं है।
सती का प्रबल आग्रह देखकर शंकरजी ने उन्हें यज्ञ में जाने की अनुमति दे दी। सती जब घर पहुंचीं तो सिर्फ मां ने ही उन्हें स्नेह दिया। बहनों की बातों में व्यंग्य और उपहास के भाव थे। भगवान शंकर के प्रति भी तिरस्कार का भाव है। दक्ष ने भी उनके प्रति अपमानजनक वचन कहे। इससे सती को क्लेश पहुंचा। वे अपने पति का यह अपमान न सह सकीं और योगाग्नि द्वारा अपने को जलाकर भस्म कर लिया।
इस दारुण दुख से व्यथित होकर शंकर भगवान ने उस यज्ञ का विध्वंस करा दिया। यही सती अगले जन्म में शैलराज हिमालय की पुत्री के रूप में जन्मीं और शैलपुत्री कहलाईं। शैलपुत्री का विवाह भी भगवान शंकर से हुआ। शैलपुत्री शिवजी की अर्द्धांगिनी बनीं। इनका महत्व और शक्ति अनंत है। पार्वती और हेमवती भी इसी देवी के अन्य नाम हैं।
वन्दे वांच्छितलाभाय चंद्रार्धकृतशेखराम्‌। वृषारूढ़ां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्‌ ॥ 
विकिपीडिया से साभार 

मेरी बात

सभी पाठकों को नमस्कार,
सभी को नवरात्र, गुड़ी पड़वा एवं नव संवत्सर 2072 की हार्दिक शुभकामनाएँ। 
प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी,

तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकंम्, 

पंचमं स्क्न्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च,

सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्। 

नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः।


आज से नवरात्र प्रारम्भ हो गए हैं आज घटस्थापना का दिवस है।

नौ दिन तक देवी की श्रद्धा से पूजा उपासना होगी।उसके बाद 


देवी के जवारे ठण्डे (विसर्जित) कर देने के बाद हम भी ठण्डे हो


जाएँगे। उसी के अन्य सृजन, नारी की स्थिति के बारे में।


क्या कहा??????? पहले से कई बेहतर स्थिति में है आज की 


नारी????????तो इस बारे में क्या ख्याल है?

हम  देवी की उपासना करते हैं, पूजा करते है, कन्या भोज कराते है। 
और 
बड़ी आसानी से कन्या भ्रूण हत्या करने/देखने का दंश भी झेल लेते हैं। 

देवी को श्रद्धा से भोग अर्पण करते हैं। 
और 
किसी का भोग कर उसे निर्भया,दामिनी बना देते हैं। 

आदर से देवी की स्थापना कर उसे घर में स्थान देते हैं। 
और 
उसके ही अन्य सृजन को शराब के  नशे में मार पीटकर घर के बाहर कर देते हैं।   

ये नारी की पुरानी नहीं आज की स्थिति है। आज का यथार्थ। कोई ज्यादा बदलाव नहीं आया है आज भी कुछ समस्याएँ वैसी ही बनी हुईं हैं जैसी सालों पुरानी थी। जबकि हमारे शास्त्रों में भी कहा गया है - 
"यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:" 
नारी को देवी का स्थान देने के पक्ष में बिलकुल नहीं हूँ मैं। बस उन्हें वो सम्मान मिले,जिसकी वो अधिकारी हैं। आज भी नारियाँ उपेक्षा, अपमान, तिरस्कार की लगातार शिकार होती हैं। कृपया एक बार जरूर सोचें भारतीय संस्कृतियुक्त वो समाज जिसके शास्त्रों में नारी को पूजनीय स्थान दिया गया है,उसे आज उसी समाज में पर्याप्त सम्मान तक प्राप्त नहीं है। आज भी कई जगह उसे भाँति भाँति से तिरस्कृत किया जाता है। शायद आप कहेंगे कि हमारी सोच तो नारियों के प्रति अच्छी है। हम तो उनके साथ इस तरीके का व्यवहार कभी नहीं करते। अगर आप इन गणमान्य लोगों की श्रेणी में आते हैं तो आपको बधाई। सहृदय नमन कि आप आज भी इंसानों की श्रेणी में आते हैं।लेकिन कुछ इंसान रूपी जानवर आज भी इसी समाज का हिस्सा हैं। जिसमें हम रहते हैं। बस आप सभी से एक ही विनती है, नववर्ष एवं देवी घटस्थापना के पावन दिन पर एक ही प्रण लें, यदि आपके आसपास कहीं भी अगर किसी भी स्त्री/बालिका/कन्या /किशोरी  पर अत्याचार होते दिखे, उससे दुर्व्यवहार होते दिखे तो उसकी मदद अवश्य करें और हो सके तो उसे रोकने का भी प्रयास अवश्य करें। उस कृत्य के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाएँ।कृपया ये न सोचें कि  मेरे सोचने से क्या  होगा। आपकी सिर्फ किसी एक को भी की गई मदद उस एक का भविष्य या जीवन तक बचा सकते हैं। और फिर स्त्री तो आखिर जननी होती है। एक स्त्री का जीवन बचाकर उससे जुड़े प्रत्येक का जीवन बचाया जा सकता है। 

आज से नारी का, नारी को, नारी के लिए ब्लॉग पर इसी से सम्बंधित एक नया लेबल शुरू करने जा रही हूँ। 'सत्यमेव जयते'।अगर आपने कभी भी किसी नारी की,किसी भी प्रकार से सहायता की हो, कुछ ऐसा किया हो, जिससे उसका जीवन प्रकाशित हुआ हो तो आप अपने उस सराहनीय कार्य के बारे में मुझे मेल करें आपके  कार्य के बारे में अपने ब्लॉग पर 'सत्यमेव जयते' लेबल के अंतर्गत प्रकाशित करना और पाठकों को बताना मेरा सौभाग्य होगा। 
धन्यवाद।
dj

एक लेखनी मेरी भी: माँ ने मुझे सँवारा है।

एक लेखनी मेरी भी: माँ ने मुझे सँवारा है।

गुरुवार, 19 मार्च 2015

माँ जैसी

अगर आप एक नारी हैं तो बताने की आवश्यकता नहीं,कि ये कविता किस नारी को लक्ष्य करके लिखी है। 
समझ आया न? तो चुपचाप पढ़ कर मौन धारण कर लीजिये और फिर से कोशिश में लग जाइये। लेकिन नीचे COMMENT जरूर कीजिये।बोलकर नहीं लिखकर।

'माँ जैसी' तुम सच में माँ-सी क्यों नहीं ?

तुम्हें हर दम कोशिश करके मैं,
सम्मान की धरा पर हूँ बिठाती,
पर फिर भी तुम मुझे रोज ही,
अर्श से फर्श पर क्यों ले आती। 
तुम्हें खुश करने के हर प्रयास में,
मेरा मन यूँ मुरझाता है,
क्योंकि मेरा किया कोई काम,
तुम्हे कभी पसंद नहीं आता है। 

माँ को तो सम्मान दिया ना,
उन पे चीखी-झल्लाई। 
तुम्हारे सम्मुख तो सही होकर भी,
अपनी हर आवाज़ मैंने दबाई।
जो माँ के लिए किया न कभी,
वो सबकुछ तुम्हारे लिए मैं करती हूँ।  
माँ के ख़याल से भी ज्यादा तो हरदम,
तुम्हारा ख़याल मैं रखती हूँ। 

दुनिया तुम्हें कहे माँ जैसी,
पर मैं तो माँ ही कहती,
पर माँ सा वो प्यार वो ममता,
फिर भी तुमसे क्यूँ नहीं मिलती। 
जो आता कभी न था वो सब,
तुम्हारे लिए ही सीखा है। 
फिर भी तुम्हें तो हर बात में,
बस मीन मेख ही दिखता है। 

माँ के सम्मुख तो सोचा कभी न,
जो चाहा वो बोल दिया।
जब भी, जो भी, आया मन में,
उनके सम्मुख खोल दिया। 
तुमसे बात करूँ तो वो बातें, 
तुमको क्यूँ नहीं भाती हैं। 
बस इसीलिए तो तुम्हारे रहते हुए भी मुझे, 
माँ की याद सताती है। 

जब भी कभी सोचूँ मैं इस पर,
खुद को दोषी ठहराती हूँ। 
अपनी और से तुम्हें खुश करने को,
फिर से तत्पर हो जाती हूँ। 
पर वो सवाल जो दिल में है वो,
कभी नहीं मिट पाएगा।
मुझे बता दो ऐ!माँ जैसी!
मेरी माँ बनने में,
आखिर तुम्हारा  क्या जाएगा?

रुकिए....! कविता अभी ख़त्म नहीं हुई है। मैं तो पहले ही बता चुकी हूँ, लेखन मुझे नकारात्मकता से सकारात्मकता की और ले जाने वाली कुंजी है। तो ये कविता NEGATIVITY पर कैसे खत्म होगी भला ? आगे सुनिए.....

लेकिन मेरा अथक प्रयास,
यूँ तो व्यर्थ न जायेगा। 
मेरे प्रयास के समक्ष ये सवाल,
ज्यादा नहीं टिक पायेगा। 
एक दिन तुम्हीं कहोगी ऐ!माँ जैसी! 
तुझ जैसी बेटी की माँ बनने में,
मुझे भी बड़ा आनन्द आएगा। 
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तो प्रयास जारी रखें और इस पर टिप्पणी का भी एक प्रयास कर ही लीजिए कविता आपकी टिप्पणियों का बेसब्री से इंतज़ार कर रही है। और मेरे लेखनी ब्लॉग पर आज लिखी कविता भी आपकी प्रतीक्षा में है पढ़ने के लिए बस क्लिक करें http://lekhaniblog.blogspot.in/

बुधवार, 18 मार्च 2015

माँ अकेली रह गई

आज पढ़ें उस माँ की स्थिति मेरी नज़र से  जिसके बच्चे किसी भी कारणवश उससे दूर रहते हों … अपनी प्रतिक्रिया जरूर व्यक्त करें। 


सब अकेली ही करती है आज माँ, 
माँ आज अकेली ही रह गई। 
सबको एक सूत्र में बांधती वो ,
दो लायक बच्चों की माँ.……  
आज अकेली ही रह गई। 

सबको साथ बिठाकर गरमा गर्म खिलाती थी जो,
आज सुबह का बना खाकर ही सो गई। 
दो बच्चों को हाथ पकड़ स्कूल छोड़ने जाती थी जो, 
आज अकेली सड़क पार करने को मजबूर हो गई। 

बेटा कमाने की चाह में,
तो बेटी ससुराल से निभाने की राह में चल पड़े। 
और इन्हें इस काबिल बनाने वाली ,
इन्हें यहाँ तक लाने वाली वो माँ ,
आज अकेली ही रह गई। 

वो खाना बनाती मैं ,सफ़ाई कर दिया करती थी। 
आज घुटने पकड़कर, उठकर, बैठकर,सबकुछ अकेली ही करती रह गई। 
वो लिस्ट बनाती, भाई सामान ले आता था ,
आज अकेली मॉल में घूम-घूमकर सब सामन जुटाती रह गई। 

हमारे हर दर्द पर दस दवाईयाँ लगा देने वाली माँ,
अपनी कमर पकड़ कराहती रह गई। 
हमारी तकलीफ में जागती थी जो रात रात भर,
आज स्व तकलीफ़ में उसकी पूरी रात यूँ आँखों में कट गई। 

जब सब करने में सक्षम थी ,मैं हर मदद कर देती थी उसकी,
आज न कर पाने की मजबूरी उसकी है,
पर साथ देने की मेरी ख्वाहिश दिल में ही रह गई। 
सब अकेली ही करती है आज माँ, 
माँ आज अकेली ही रह गई। 

सबको एक सूत्र में बांधती वो,
दो लायक बच्चों की माँ.……  
आज अकेली रह गई। 
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मेरी माँ... प्यारी माँ.... मम्मा....

आज पढ़िए माँ के लिए लिखी मेरी स्वरचित कविता 

कच्ची मिट्टी थी मैं तो बस,
मुझे आकार तो मेरी माँ ने दिया।
अनगढ़, मूर्ख, अज्ञानी थी मैं,
मुझे ज्ञान से साकार तो मेरी माँ ने किया।

दर्द किसी ने भी दिया हो मुझे,
उन पर आँसू तो माँ ने बहाया।
सीने में दफ़न हर इक दर्द पर,
मलहम तो बस माँ ने लगाया।

अनाज उगाया बेशक किसी और ने,
पर खाना तो मुझे माँ ने खिलाया।
जब सोते थे सब चैन से और में जागती रही,
मुझे थपकी देकर तो सिर्फ माँ ने सुलाया।

साथ छोड़ दिया जब सब ने मेरा,
मेरी और हाथ तो माँ ने बढ़ाया।
गलत कहती रही पूरी दुनिया जब मुझे,
बड़ी शिद्दत से मुझे सही तो माँ ने ठहराया।

डरकर छुपने की जगह जब भी तलाशी मैंने,
मेरे हाथ में तो बस माँ का ही आँचल आया। 
इसीलिए शायद
ईश्वर के आगे आँखे बंद कर जब भी खड़ी हुई मैं,
मेरी नज़रों के सामने तो बस मेरी माँ का ही चेहरा आया। 

मेरी दोनों माँ मम्मी और मम्मा (बड़ी मम्मी ) को दिल से समर्पित
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रविवार, 15 मार्च 2015

बेटी हूँ मैं

बेटी हूँ मैं,
मुझे बेटा कहकर न बुलाओ। 
बेटी रहकर भी बेटे का फ़र्ज़ मैं निभा सकती हूँ, 
बेटा कहकर यूँ मेरा अस्तित्व न मिटाओ। 

मत करो तुलना उस बेटे से मेरी 
अंत समय जो माँ का सहारा न बना 
पूरा जीवन उस पर लुटा देने वाली माँ की,
बूढ़ी अँखियों का जो उजियारा न बना,

बेटी हूँ मैं गर्व से कहूँगी 
अपनी माँ के लिए हर दर्द सहूँगी। 

बेटी हूँ मैं,
मुझे बेटा कहकर न बुलाओ। 
बेटी रहकर भी बेटे का फ़र्ज़ मैं निभा सकती हूँ, 
बेटा कहकर यूँ मेरा अस्तित्व न मिटाओ। 

मत करो तुलना उस लाड़ले बेटे से मेरी 
ऊँगली पकड़ कर चलना सिखाने वाले पिता का,
निर्दयता से जिसने  हाथ छोड़ दिया ,
अंत समय में उनकी डूबती नैया का साथ छोड़ दिया। 

बेटी हूँ मैं गर्व से कहूँगी
पिता के जीवन को स्वर्ग मैं यहीं करूंगी 

बेटी हूँ मैं,
मुझे बेटा कहकर न बुलाओ। 
बेटी रहकर भी बेटे का फ़र्ज़ मैं निभा सकती हूँ, 
बेटा कहकर यूँ मेरा अस्तित्व न मिटाओ।
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उन्हें पसंद नहीं

पढ़ाना तो चाहते हैं मुझे,
पर उन्हें मेरा कॉलेज जाना,
पसंद नहीं। 
शादी के लिए साज़ो सामान की तरह प्रदर्शन मंज़ूर है मगर ,
मेरा घर के बाहर जाना,
उन्हें पसंद नहीं। 
कर्तव्य सारे पूरे करूँ मौन रहकर उनकी है यही मंशा ,
पर किसी अधिकार के लिए मेरा आवाज़ उठाना,
उन्हें पसंद नहीं। 
ऊँचे पायदान पर देखना तो चाहते हैं वो मुझे,
पर घर के काम छोड़ मेरा नौकरी पे जाना,
उन्हें पसंद नहीं।
खाना पकाते हुए ही अच्छी लगती हूँ मैं उन्हें, 
मेरा गद्य पद्य बनाना,
उन्हें पसंद नहीं।
कोचिंग पढ़ाकर पैसा कमाऊँ तो विद्वान हूँ मैं,
पर मेरा मन के शब्दों को यूँ कविता में पिरो जाना,
उन्हें पसंद नहीं।
बर्तन-कपड़े धोती हुई ही पसंद हूँ मैं उन्हें, 
मेरा लिखकर मन के दर्द धोना,
उन्हें शब्दों में संजोना, 
उन्हें पसंद नहीं।
वो खाते हुए मुझे दस बार उठाए तो चलता है,
पर मेरा चलते फिरते कुछ खाते जाना,
उन्हें पसंद नहीं।
नवरात्री में कन्या भोज, कन्या पूजन पुण्य है उनके लिए 
मगर मेरे गर्भ में उसी कन्या का आ जाना
उन्हें पसंद नहीं।
लेखन, मेरी इच्छाएं, मेरे मन मुताबिक जीना ही तो जीवन है मेरे लिए,
फिर कैसे परवाह कर लूँ मैं उनकी, 
जिन्हे मेरा ज़िंदा रह जाना ही पसंद नहीं। 

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इस ब्लॉग के अंतर्गत लिखित/प्रकाशित सभी सामग्रियों के सर्वाधिकार सुरक्षित हैं। किसी भी लेख/कविता को कहीं और प्रयोग करने के लिए लेखक की अनुमति आवश्यक है। आप लेखक के नाम का प्रयोग किये बिना इसे कहीं भी प्रकाशित नहीं कर सकते। dj  कॉपीराईट © 1999 – 2020 Google
मेरे द्वारा इस ब्लॉग पर लिखित/प्रकाशित सभी सामग्री मेरी कल्पना पर आधारित है। आसपास के वातावरण और घटनाओं से प्रेरणा लेकर लिखी गई हैं। इनका किसी अन्य से साम्य एक संयोग मात्र ही हो सकता है।

मेरा जवाब

उसका सवाल …?????

क्या लिख लोगी तुम,????
क्या लिख लोगी,?????
नारी हो आखिर .......... 
क्या लिख लोगी ????????
हर दम बस,
मौन ही तो रहती हो।  
दुनिया के सब दर्द गम,
चुपचाप सहती हो। 
बस करती रहती हो,
तुम सबसे अनुरोध। 
कभी कर ही नहीं पाती तुम,
किसी का विरोध। 
तुम्हारी क़लम, बस चुप्पी ही लिखेगी। 
तुम्हारी प्रतिभा, दुनिया को क्या ख़ाक दिखेगी। 
क्या लिख लोगी , तुम क्या लिख लोगी,
नारी हो तुम आखिर क्या लिख लोगी ??????????????

मेरा जवाब.......... । । । । 


नारी हूँ मैं,
शक्ति हूँ मैं,
इतना तो दम, 
रखती हूँ मैं।  
मेरी ताकत को, 
तुम क्या जानो 
स्त्री के स्त्रीत्व को,
तुम क्या पहचानों 
मेरी चुप्पी भी.
वाचाल है,
जब गूंजी,
मचा बवाल है,
तुम चाहे दबा दो,
आवाज़ मेरी,
नहीं रुकेगी,
अब ये लेखनी। 
नारी का मौन,
ये मुखर करेगी। 
मेरी चुप्पी,
अब तुम क्या,
ये सारी दुनिया सुनेगी।
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मौन हूँ मैं

अच्छा है कि मौन हूँ मैं,
सबकी नज़र में,
गौण हूँ मैं।
जिस दिन,
बोल उठी,
ये जीभ रूपी तलवार,
तुम सब समझ ही जाओगे कि
कौन हूँ मैं 
तो फिर.…… 
अच्छा है कि मौन हूँ मैं,
और
तुम सबकी नज़र में,
गौण हूँ मैं।
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रविवार, 8 मार्च 2015

नारी ब्लॉग के विषय में

नारी विषय पर ब्लॉग लिखने की अभिलाषा मन में काफी समय से थी। परन्तु कुछ कारणों से शुरुआत हो ही नहीं पा रही थी इस ब्लॉग को शुरू करने के लिए आज (महिला दिवस) से अच्छा दिन तो हो ही नहीं सकता।

उद्देश्य- एक नारी से मुझे(एक नारी को) जो भी मिला उसे अन्य नारी को समर्पित कर सकूँ इसी मंशा के साथ शुरू कर रही हूँ।


ब्लॉग में क्या -नारी से जुड़े सभी विषयों का समावेश करने का प्रयत्न करुँगी।नारी पर कहानियां, कवितायेँ, आज  स्थिति, पुरानी स्थिति, क्या आज की नारी तनाव मुक्त है ? सौंदर्य सेहत से जुड़े मुद्दों पर भी प्रकाश डालने का प्रयास रहेगा। आपके सुझावों के ज़रिये मार्गदर्शन का इंतज़ार रहेगा।

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