गुरुवार, 7 मई 2015

तेरी प्रीत

मैंने जोग लिया हर ज़हर पिया,
तेरी प्रीत में ये जग छोड़ दिया, 
इस प्रीत में ऐसी खो गई मैं ,
हर शख्स से नाता तोड़ लिया।  

बैरी बन गया तू ही मोरा पिया,
यही सोच के अब ये जले जिया, 
तेरी प्रीत में जग से बैर लिया,
तूने जग से ही नाता जोड़ लिया।  

हर शख्स मुझे समझाए यहाँ ,
तेरी प्रीत को ही ठुकराये जहाँ, 
मैं साज़ हूँ तू संगीत पिया ,
बिन धड़के कैसे फिर रहे जिया। 

मेरे दिल की लगी बस मैं जानूँ ,
तेरी प्रीत को ही सब कुछ मानूँ, 
तेरे प्रेम की ही धरा में रहूँ  ,
फिर कैसे तुझे अलविदा में कहूँ।  

एक बस तेरा इंतज़ार करूँ ,
बस तुझसे ही आँखें चार करूँ, 
बैराग सा है इक रोग सा ये,
इस इश्क़ में सारे दर्द सहूँ।

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4 टिप्‍पणियां:

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